वैसे पौधों के समूह को जो प्रकृति में स्वतः उगते हो
बड़े-बड़े वृक्षों एवं झाड़ियों द्वारा ढंके हुए विशाल क्षेत्र को
पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem)
वनस्पति (Vegetation) और वन्य प्राणी (Wildlife) में आपसी सम्बन्ध हुआ करता है और दोनों ही एक-दूसरे पर आश्रित (Dependent) होते हैं। यह पारस्परिक सम्बन्ध उस क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यावरण (Environment) के साथ भी बना होता है। इसे
किसी विस्तृत क्षेत्र में पाए जाने वाले समस्त वनस्पति तथा प्राणियों का विशाल पारिस्थितिक समुदाय (Ecological Community)
भूतल पर वनस्पतियों तथा प्राणियों के वितरण प्रतिरूपों पर जलवायु (Climate) का सर्वाधिक प्रभाव होता है। यही कारण है की बायोम के प्रकारों का निर्धारण सामान्यता जलवायु प्रकार के अनुसार होता है। जैसे- टुंड्रा बायोम (Tundra Biome), शीतोष्ण कटिबंधीय बायोम (temperate zone Biome) , उष्ण कटिबंधीय बायोम (Tropical zone Biome)। जबकि स्थलीय तथा जलीय स्थिति के अनुसार बायोम को 2 वृहत वर्गों में बाँटा जाता है - स्थलीय बायोम (Terrestrial Biome) और जलीय बायोम (Aquatic Biome)।
भारत के विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति का विकास हुआ है। यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति के विकास एवं वितरण पर मुख्यः दो कारक (Factor) -
वर्षा (Rainfall ) की मात्रा के आधार पर
- ऊष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन या वर्षा वन
- ऊष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन
- ऊष्ण कटिबंधीय कँटीले वन और झाड़ियाँ
- पर्वतीय वनस्पति
- डेल्टाई या ज्वारीय वन
ये वनस्पति उन क्षेत्रों में पाई जाती है, जहा वार्षिक वर्षा 200 C.M से अधिक होती हो और वर्ष भर ऊँचा तापमान (औसत 24° C ) और वायु में आर्द्रता 70 % से अधिक होती है। इन वनो में अधिक वर्षा होने के कारण इन्हे अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय चिरहरित वन -Semi Tropical Evergreen Forest,
इन क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा तथा ऊँचा तापमान के कारन वृक्ष काफी सघन एवं तेजी से बढ़ते है वृक्षों की सघनता इतना अधिक होता है की सूर्य का प्रकाश ज़मीन तक नहीं पहुँच पाता है। सूर्य प्रकाश प्राप्ति की होड़ में वृक्ष प्रायः 60 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई तक बढ़ जाते है। अथार्त वृक्ष Insurmountable) होता है। इन वनों प्रवेश कर लकड़ी काटना कठिन कार्य है क्योंकि यहाँ एक ही स्थान पर एक किस्म के वृक्ष न मिलकर अनेक प्रजातियों के वृक्ष मिश्रित अवस्था में मिलते है साथ ही इन वनों की लकड़ियाँ कड़ी और भरी होती है।
ये वन प्राकृतिक वनस्पति,जैव विविधता से काफी धनी है इन वनों में अनेक बहुमूल्य लकड़ियों के वृक्ष पाए जाते हैं जैसे
(2) उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forest)
ये पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forest) का है। ये वन अपनी पत्तियों को एक साथ भी कहते है।
वर्षा मात्रा के आधार पर इनको पुनः 2 भागों में बाँटा जाता है।
(A) उष्ण कटिबंधीय
(B) उष्ण कटिबंधीय शुष्क
(A) उष्ण कटिबंधीय
(B) उष्ण कटिबंधीय शुष्क
आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Wet Deciduous Forest)
इन वनो का विकास
(B) पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous Forest)
ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहाँ औसत वार्षिक वर्षा
(3) उष्ण कटिबंधीय कटीले वन (Tropical Thorny Forest)
ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहाँ औसत वार्षिक वर्षा
(4) पर्वतीय वन (Mountain Forests)
जिस प्रकार धरातल पर अक्षांश बदलने से वनस्पति में बदलाव आ जाती है उसी प्रकार पर्वर्तों पर ऊँचाई के बढ़ने से वनस्पति में बदलाव आ जाती है।
भारतीय पर्वतीय वनो को क्षेत्र के आधार पर 2 भागों में बाटा जा सकता है -
(A) प्रायद्वीपीय पर्वतीय वनस्पति
(B) हिमालय क्षेत्र का पर्वतीय वन
(A) प्रायद्वीपीय पर्वतीय वनस्पति (Vegetation of Peninsular Mt.) - ये वन प्रायद्वीपीय भारत में मुख्यतः पश्चिमी घाट, विंध्याचल और नीलगिरी पर्वतों पर पाये जाते है इन वनो को पुनः 2 उपवर्गों में बांटा जा सकता है - (i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वन और (ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वन
(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वन (Subtropical humid mountain forest) - यह वनस्पति प्रायद्वीपीय भारत में 1070 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, सतपुड़ा, महादेव मैकाल, नीलगिरि, कार्डामम एवं अन्नामलाई की पहाड़ियों पर पाई जाती है। यह वनस्पति सदाबहार होती है। वृक्षों की लकड़ियां लगभग मुलायम होती है।
आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वन (Temperate humid mountain forest)- यह वनस्पति प्रायद्वीपीय भारत में 1500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर नीलगिरि, पालनी एवं अन्नामलाई की पहाड़ियों पर पाई जाती है।इन वनो को शोला (Shola) के नाम से जाना जाता है। ये वन अधिक सघन नहीं होते है परन्तु सतह पर झाड़ियाँ उपस्थित रहती है। इन वनों में प्रायः मैग्नोलिया, लारेल, यूक्लिप्टस, एल्म आदि वृक्ष पाये जाते है। जो की तेल और औषधियों के लिए उपयोगी वृक्ष है
(i) उष्ण कटिबंधीय वनस्पति
(ii) उपोष्ण कटिबंधीय वनस्पति
(iii) शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पति और
(iv) अल्पाइन वनस्पति।
(i) उष्ण कटिबंधीय
(ii) उपोष्ण कटिबंधीय (Tropical Deciduous Vegetation)- पश्चिम की ओर घटती वर्षा और बढ़ती ऊँचाई के कारण वर्षा वनों के बजाये उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वनस्पति उगते हैं। इन वनों में मुख्य रूप से साल, शीशम , सागवान , बांस के वृक्ष एवं सबई घास उगते है। 920 मी. की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आर्द्र साल वृक्ष और 1,370 मी. की ऊँचाई पर शुष्क साल वृक्ष के वन मिलते है।
(iii) शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पति (Temperate Tropical Vegetation)- बांज (Oak), भोजपत्र (Birch), मैग्नेलिया, एल्डर , लारेल, चीड़, स्प्रूस, देवदार (Cedar) आदि वृक्ष। बांज (Oak) और शंकुधारी वृक्षों के सदाहरित वन लघु हिमालय (Lesser Himalaya) की पर मिलते है। 920 मी. से लेकर 1,640 मी. की ऊँचाई तक चीड़ प्रमुख वृक्ष हैं। देवदार एक अत्यंत मूल्यवान स्थानीय प्रजाति का वृक्ष है।जो 2700 मी. की ऊँचाई पर मुख्य रूप से हिमालय की श्रेणी के पश्चिम भाग में उगता है। नीला चीड़ और स्प्रूस 2225 मी. से 3048 मी. की ऊँचाई के बीच उगते है।
(iv) अल्पाइन वनस्पति (Alpine Vegetation)-और चरागाह (Meadows) की झाँकी पस्तुत करती है जिसे काश्मीर में मर्ग कहते है (जैसे- गुलमर्ग, सोनमर्ग) और उत्तराखंड में बुग्याल एवं पयाल कहा जाता है (जैसे फूलों की घाटी- गढ़वाल हिमालय)। अल्पाइन वनस्पति पश्चिमी हिमालय में 3900 मी. तथा पूर्वी हिमालय में 4450 मी. की ऊँचाई तक विस्तृत हैं।
(ii) उपोष्ण कटिबंधीय (Tropical Deciduous Vegetation)- पश्चिम की ओर घटती वर्षा और बढ़ती ऊँचाई के कारण वर्षा वनों के बजाये उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वनस्पति उगते हैं। इन वनों में मुख्य रूप से साल, शीशम , सागवान , बांस के वृक्ष एवं सबई घास उगते है। 920 मी. की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आर्द्र साल वृक्ष और 1,370 मी. की ऊँचाई पर शुष्क साल वृक्ष के वन मिलते है।
(iii) शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पति (Temperate Tropical Vegetation)- बांज (Oak), भोजपत्र (Birch), मैग्नेलिया, एल्डर , लारेल, चीड़, स्प्रूस, देवदार (Cedar) आदि वृक्ष। बांज (Oak) और शंकुधारी वृक्षों के सदाहरित वन लघु हिमालय (Lesser Himalaya) की पर मिलते है। 920 मी. से लेकर 1,640 मी. की ऊँचाई तक चीड़ प्रमुख वृक्ष हैं। देवदार एक अत्यंत मूल्यवान स्थानीय प्रजाति का वृक्ष है।जो 2700 मी. की ऊँचाई पर मुख्य रूप से हिमालय की श्रेणी के पश्चिम भाग में उगता है। नीला चीड़ और स्प्रूस 2225 मी. से 3048 मी. की ऊँचाई के बीच उगते है।
(iv) अल्पाइन वनस्पति (Alpine Vegetation)-और चरागाह (Meadows) की झाँकी पस्तुत करती है जिसे काश्मीर में मर्ग कहते है (जैसे- गुलमर्ग, सोनमर्ग) और उत्तराखंड में बुग्याल एवं पयाल कहा जाता है (जैसे फूलों की घाटी- गढ़वाल हिमालय)। अल्पाइन वनस्पति पश्चिमी हिमालय में 3900 मी. तथा पूर्वी हिमालय में 4450 मी. की ऊँचाई तक विस्तृत हैं।
(5) डेल्टाई वन (Delta Forest)
यह एक विशेष प्रकार की वनस्पति है जो समुन्द्र तटीय क्षेत्रों के डेल्टाई एवं दलदल प्रदेशों में पाये जाते हैं। यहाँ समुन्द्र का खारा जल तथा नदियों के मीठा जल के मिश्रण वाले क्षेत्र में एक विशेष प्रकार का पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण होता है जिसमे डेल्टाई वन के विकास होता है। यह वनस्पति चिरहरित वनो का ही एक प्रकार है जिनके जड़ें पानी के ऊपर निकली हुई होती है जो जटा की तरह या पक्षियों के पंजे के सामान दिखाई देती है। इन्हे
ये वन बंगाल की खाड़ी के तटीय प्रदेशों में गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों के डेल्टाई भाग पश्चिम बंगाल), महानदी के डेल्टाई क्षेत्र (उड़ीसा), गोदावरी एवं कृष्णा नदी के डेल्टाई क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) और कावेरी नदी डेल्टाई क्षेत्र (तमिलनाडु) और कच्छ , काठियावाड़ (गुजरात), खम्भात की खाड़ी के तटीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। इन वनों में मुख्यत जल मे न सड़ पाने के कारण इनका उपयोग नाव बनाने में किया जाता हैं। सुंदरवन का नाम सुंदरी वृक्ष के नाम पर पड़ा।
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